Friday, May 27, 2011

जिंदगी से मांगो जिंदगी से ज्यादा

जब मैं घुटनों के बल चलता था
और टूटे फूटे शब्द बोलता था
जो सिर्फ माँ समझती थी

उन दिनों एक रोज्  यूँ हुआ था
माँ से लिपटकर मैं चाँद की जिद्द कर बैठा था
खिलौना समझ माँगा था
और अपनी जिद्द पर ऐंठा था
फर्श पे लोट चाँद चाँद चिल्लाता था
तब माँ थी
थाली में चाँद उतार लाती थी
अब चाँद है, जिद्द है
पर माँ कहा

माँ मैं अब भी वैसे ही रोता  हूँ
माँ मैं अब भी वैसा ही जिद्दी हूँ
पर अब वो थाली
वो घुटनों का चलना कहाँ

मांगो  न मांगो अब वो चाँद मिलता नहीं
तुम लाख चिल्लाओ
फर्श पे लेटो या खाना ना खाओ
थाली में अब वो चाँद उतरता नहीं