Friday, May 27, 2011

जिंदगी से मांगो जिंदगी से ज्यादा

जब मैं घुटनों के बल चलता था
और टूटे फूटे शब्द बोलता था
जो सिर्फ माँ समझती थी

उन दिनों एक रोज्  यूँ हुआ था
माँ से लिपटकर मैं चाँद की जिद्द कर बैठा था
खिलौना समझ माँगा था
और अपनी जिद्द पर ऐंठा था
फर्श पे लोट चाँद चाँद चिल्लाता था
तब माँ थी
थाली में चाँद उतार लाती थी
अब चाँद है, जिद्द है
पर माँ कहा

माँ मैं अब भी वैसे ही रोता  हूँ
माँ मैं अब भी वैसा ही जिद्दी हूँ
पर अब वो थाली
वो घुटनों का चलना कहाँ

मांगो  न मांगो अब वो चाँद मिलता नहीं
तुम लाख चिल्लाओ
फर्श पे लेटो या खाना ना खाओ
थाली में अब वो चाँद उतरता नहीं

Saturday, March 19, 2011

बोलो बोलो वो रंग कौनसा

रंग ही रंग चारों ओर
बोलो बोलो हर रंग कौनसा

कोई हमे बतलाये माँ के प्यार का रंग कौनसा ?
माँ जब सर पे हाथ फिराए तो माथे का रंग कौनसा ?
सुबह से सांझ सूरज का रंग  कौनसा ?
उसकी हंसी का रंग कौनसा ?
उसकी हंसी पे मेरी खुशी का रंग कौनसा ?
सावन की ठंडी फुहार का रंग कौनसा ?
कोमल एड़ी से दबी मिट्टी का रंग कौनसा ?
बोलो बोलो बचपन का रंग कौनसा  ?

कुछ बातों का रंग मुझको बतला दो
इन बातों का रंग मुझको बतला दो

वो गली जो बिन कहे  मुढ जाती है
वो शाम जब वो बिन कहे आ जाती है
वो रात जो तारों  में घुल जाती है
वो बात जो बस होठों पे रह जाती है
वो रंगोली जो बस आधी ही बन पाती है
वो सुबह की चाय जो साँसों में चढ जाती है
वो ओस जो पत्ते से बिन कहे ढलक  जाती है
वो नन्ही उम्मीद जो अकेले फलक तक दौड जाती है
वो मेले में खिलौना सा
वो बचपन सलोना सा
माँ की गोद में सोने का
नंगे  पाँव दौड़ने का
और वो एहसास तेरे और मेरे होने का
वो रंग कौनसा
बोलो बोलो वो रंग कौनसा